असुर, राक्षस या दैत्य कोई नस्ल नहीं बल्कि आर्यों के द्वारा थोपा गया नाम है
🌾 असुर, राक्षस या दैत्य कोई नस्ल नहीं बल्कि आर्यों के द्वारा थोपा गया नाम है
एक विश्लेषण 🌾
असुर, राक्षस, दैत्य और निशाचर ऐसे नाम हैं जो धर्म शास्त्रों,इतिहास एंव समाजशास्त्र के विद्वानों में हमेशा चर्चा के विषय रहें हैं। अबतक की खोजों से ये सिद्ध हो चुका हैं कि ये सभी नाम एक ही नश्ल(जाति) के विभिन्न नाम हैं। और वो नाम भारत के प्रथम निवासी ' आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण' का हैं।
भारत के कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत के जो आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण है वही असूर, निशाचर , राक्षस और दैत्य हैं। कुछ विद्वानों ने असुर को असीरिया जाति से जोड़ा हैं। जो भू-मध्य सागरीय क्षेत्र के निवासी हैं। पर ऐसा कहना सिर्फ़ और सिर्फ़ भ्रम पैदा करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। असुर शब्द तो आस्ट्रेलाइड , द्रविड़यण को इसलिए दिया गया था क्योंकि वे सुर नहीं थे। सुर आर्यों को कहते हैं सुर का अर्थ होता हैं 'देवता' ।
आर्यों ने अपने को देवता और अनार्यों को असुर कहा। असुर का अर्थ- भयावह, काली, अप्राकृतिक सींग, मयावी, निशाचर आदि माना गया। आस्ट्रेलाइड, द्रविड़यण का रंग काला, कद छोटा, बाल काले घुँघराले तथा होंठ मोटे होते हैं। वो इसलिए क्योंकि आस्ट्रेलाइड, द्रविड़यण 'ऊष्ण कटिबंध' क्षेत्र के निवासी हैं। और ये क्षेत्र भारत में आता हैं। दूसरी तरफ आर्यों का कद लंबा, रंग गेहुँआ और बाल भूरे होते हैं। क्योंकि ये लोग ठंढे प्रदेश यानि यूरेशिया मध्य एशिया के निवासी हैं।
हिन्दु धर्म ग्रन्थों में अनार्यों के दो नाम 'राक्षस' और 'निशाचर' भी पाए जाते हैं। ये नाम बाद के हैं। पर जो ऐतिहासिक तथ्य हैं उनके आधार पर सही रखे गए प्रतीत होते हैं। 'राक्षस' रक्ष संस्कृति का शब्द हैं जिसका अर्थ है रक्षा करने वाला। जब आर्यों ने आस्ट्रेलाइड, द्रविड़यण के इस देश पर हमला बोला तो ये अनार्य रक्षा का काम करते थे। उन्होंने ऐसी समूह बना रखीं थी जो आर्यों के हमले से अपने लोगों की रक्षा करती थी। आर्यों ने उनके समूहों का नाम राक्षस रख दिया था। इसके साथ ये समूह रात में घूम-घूमकर पहरेदारी करती थी इसलिए इनको निशाचर नाम भी दिया गया(निशा - रात, चर - चलनेवाला)।
दूसरा राक्षस का संबंध रावण से हैं। रावण अपने युग का सबसे महाप्रतापी, महाज्ञानी, सर्वजयी और अजेय योद्धा थे। आस्ट्रेलिया, लंका, जावा, कम्बोडिया, अफ्रीका आदि देशों पर उनका अवाध शासन था। संम्पूर्ण दक्षिण सागर पर उनका अधिकार था। वह दक्षिण का राजा होने के नाते वह दक्षिण का रक्षक था। रक्षक होने के नाते उसने 'रक्षोअहम् (मैं दक्षिण का रक्षक हूँ ) कहकर ' रक्ष संस्कृति' की स्थापना की थी। अपने समूह को उसने 'रक्षम् 'कहकर सम्बोधित किया। इस प्रकार आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण का वंशज रावण राक्षस कहलाया।
असुर, राक्षस, दैत्य और निशाचर कोई आदिवासियों के वंश का नाम नहीं हैं बल्कि आर्यों के द्वारा थोपा गया नाम हैं। आर्यों ने राक्षस शब्द का प्रयोग नीच, क्रूर, पापी,अज्ञानी के रूप में किया। जिससे भय पैदाकर आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण को खत्म करके उसके देश पर कब्जा कर लेना। अनार्यों का नस्ल आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण हैं, न कि राक्षस, असूर और दैत्य।
🌾आदिवासी महिला शक्ति भारत 🌾
Comments
Post a Comment