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Showing posts from October, 2019

असुर, राक्षस या दैत्य कोई नस्ल नहीं बल्कि आर्यों के द्वारा थोपा गया नाम है

🌾  असुर, राक्षस या दैत्य कोई नस्ल नहीं बल्कि आर्यों के द्वारा थोपा गया नाम है   एक विश्लेषण 🌾 असुर, राक्षस, दैत्य और निशाचर ऐसे नाम हैं जो धर्म शास्त्रों,इतिहास एंव समाजशास्त्र के विद्वानों  में हमेशा चर्चा के विषय रहें हैं। अबतक की खोजों से ये सिद्ध हो चुका हैं कि ये सभी नाम एक ही नश्ल(जाति) के विभिन्न नाम हैं। और वो नाम भारत के प्रथम निवासी ' आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण' का हैं।   भारत के कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत के जो आस्ट्रेलाइड,द्रविड़यण है वही असूर, निशाचर , राक्षस और दैत्य हैं। कुछ विद्वानों ने असुर  को असीरिया जाति से जोड़ा हैं। जो भू-मध्य सागरीय क्षेत्र के निवासी हैं। पर ऐसा कहना सिर्फ़ और सिर्फ़ भ्रम पैदा करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं।  असुर शब्द  तो आस्ट्रेलाइड , द्रविड़यण को इसलिए दिया गया था क्योंकि वे सुर नहीं थे। सुर आर्यों  को कहते हैं सुर का अर्थ होता हैं 'देवता' । आर्यों ने अपने को देवता और अनार्यों को असुर कहा। असुर का अर्थ- भयावह, काली, अप्राकृतिक सींग, मयावी, निशाचर आदि माना गया।  आस्ट्रेलाइड, द्रविड़यण ...

महिलाओं के स्तन ढंकने के हक के लिए आंदोलन करने वाले महात्मा अय्यंकालि

महिलाओं के स्तन ढंकने के हक के लिए आंदोलन करने वाले महात्मा अय्यंकालि भारत को आधुनिक बनाने, दलितों और पिछड़ों में आत्म सम्मान की भावना पैदा करने और महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने में महात्मा अय्यंकालि की भूमिका ठीक वैसी ही है, जैसी ज्योतिबा फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरुऔर ईवी. रामासामी पेरियार की है. दलित महिलाओं की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए उनके योगदान को आज भी याद किया जाता था. उनके आंदोलन की वजह से दलित महिलाओं को केरल में अपना स्तन ढंकने का अधिकार मिला और वे भी ब्लाउज पहनने लगीं. ऊंची जाति की उपस्थिति में पहले उन्हें अपने स्तन के कपड़े हटा लेने होते थे. अय्यंकालि का जन्म तिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर दूर वेंगनूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था. पिता अय्यन और मां माला की आठ संतानों में वे सबसे बड़े थे. उनकी जाति पुलायार (पुलाया) थी, जो वहां अछूत जातियों में भी सबसे नीचे की मानी जाती है. उनकी हैसियत भू-दास के समान थी. जमींदार लोग, मुख्यतः नायर, अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को काम में झोंक देते थे. सुबह से शाम तक काम करने के बाद उन्हें मिलता था, बामुश्किल 600 ग्राम च...